जल संरक्षण व जैविक खेती को बढ़ावा देने पर जोर देते : स्वामी विवेकानंद

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स्वामी विवेकानंद जी के विचार वाला आश्रम

अंधाधुंध विकास की होड़ में प्रकृति के साथ अनावश्यक छेड़छाड़ ने पर्यावरण के बदलते मिजाज के संग मानव जीवन ही को ही नहीं, बल्कि धरा की प्रकृति को भी बदल कर रख दिया है। शायद यही वजह है कि युगद्रष्टा स्वामी विवेकानंद ने वर्ष 1899 में ही भविष्य की परिस्थितियों को भांपते हुए जल संरक्षण और जैविक खेती को बढ़ावा देने का संदेश दिया था। दुमका के रामकृष्ण आश्रम के स्वामी विश्वरूप महाराज कहते हैं कि वेदांत दर्शन के ज्ञाता स्वामी विवेकानंद ने उत्तराखंड के लोहाघाट के अद्वैत आश्रम में जल संरक्षण व जैविक खेती का संदेश वर्ष 1901 में दिया था।

जल संरक्षण व जैविक खेती का संदेश

स्वामी विश्वरूप महाराज कहते हैं कि स्वामी विवेकानंद हिमालय के किसी खूबसूरत स्थल पर अद्वैत आश्रम की स्थापना करना चाहते थे। इसके लिए उन्होंने कई शिष्यों को पत्र लिखा था। उन्होंने अल्मोड़ा के लाला बद्री साह को भी एक पत्र लिखा था, जिसमें उन्होंने लिया कि प्रिय साह जी, मैं एक मठ स्थापित करना चाहता हूं। मेरी इच्छा है कि वह अल्मोड़ा या उसके समीप किसी स्थान पर हो। मैं चाहता हूं एक छोटी-सी पहाड़ी मिल जाए तो अच्छा रहेगा। उनके इस कार्य में अंग्रेज शिष्य कैप्टन सेवियर व उनकी पत्नी भी जुट गई थीं। सेवियर दंपती ने 19 मार्च 1899 को अद्वैत आश्रम तैयार किया, जिसे आज मायावती आश्रम नाम से जाना जाता है। पेड़-पौधों, पशु-पक्षियों से आच्छादित निर्जन वन में स्थित इस आश्रम में स्वामी विवेकानंद तीन जनवरी 1901 को आए थे। अपने 15 दिन के प्रवास में उन्होंने अध्ययन, लेखन व ध्यान में समय व्यतीत किया था।

इस आश्रम की जैव विविधता आज भी देखते ही बनती है। यह ईश्वर के उपासना का अद्भुत केंद्र है। यहां एक अस्पताल भी संचालित हैं। स्वामी विश्वरूप महाराज कहते हैं कि स्वामी विवेकानंद सेवा व त्याग के प्रतिमूर्ति थे। कहा कि उत्तराखंड के पांचवें व अंतिम प्रवास के दौरान स्वामी जी ने इस आश्रम में रहते हुए जैविक खेती को बढ़ावा देने की पहल की थी। आज भी इस आश्रम में गोपालन की परंपरा है, जिन्हें खाने में पौष्टिक चारा दिया जाता है। उनके गोबर की खाद से ही खेती की जाती है। गेहूं के अलावा तमाम तरह की सब्जियां उगाई जाती हैं। इसके अलावा आश्रम परिसर में ही एक झील है, जिसे विवेक झील के नाम से जाना जाता है। जब स्वामी जी ने इस जगह को देखा तो काफी प्रभावित हुए थे। तब उन्होंने कहा था कि अपने जीवन के अंतिम भाग में मैं समस्त जनहित के कार्यों को छोड़ यहां आऊंगा और ग्रंथ रचना तथा संगीत में अपना समय बिताऊंगा।

स्वामी विश्वरूप महाराज कहते हैं कि इस जगह को अब और खूबसूरत बना दिया गया है, जो जल संरक्षण का संदेश भी देता है।

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दुमका के श्रीरामकृष्ण आश्रम में जल संरक्षण की पुख्ता व्यवस्था: स्वामी विश्वरूप महाराज कहते हैं कि दुनिया भर में तेजी से जल संकट गहराता जा रहा है। ऐसे में अब बूंद-बूंद सहेजने की जरूरत है। स्वामी विवेकानंद के संदेशों को गंभीरता से समझने व आत्मसात करने की जरूरत है। सेवा और त्याग की भावना सबसे अहम है। कहा कि दुमका के श्रीरामकृष्ण आश्रम के विभिन्न हिस्सों में जल संरक्षण के लिए वैज्ञानिक तरीके से आधा दर्जन से अधिक स्थायी संरचनाएं तैयार कर जल संरक्षण किया जाता है। आश्रम में उपयोग हो रहे जल के अलावा इन संरचनाओं के माध्यम से वर्षा जल को भी संरक्षित किया जाता है। इसके अलावा यहां युवाओं के निशुल्क शिक्षण की व्यवस्था भी है।