जन्म अष्टमी विशेष

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कठिन काल कलियुग्ग में, करमैती निकलंक रही, नस्वर पति रति त्यागि, कृष्ण पद सौं रति जोरी…। यह पंक्ति श्रीनाभाजी के भक्तमाल ग्रंथ की है। जो खंडेला निवासी भक्त शिरोमणी करमैती बाई के बारे में लिखी है। जो कृष्ण भक्ति में अपने गौने की पहली रात को ही घर छोड़कर पैदल ही वृंदावन पहुंच गई थी। ग्रंथ के अनुसार 18 दिन भूखी- प्यासी रहने के बाद खुद भगवान श्रीकृष्ण ने संत वेश में प्रकट होकर उन्हें भोजन करवाया था। उन्हीं करमैती बाई की श्रीकृष्ण प्रतिमा की बांके बिहारी मंदिर में करीब 600 साल से पूजा हो रही है। जिसे करमेती बाई ने वृंदावन से उन्हें लौटाने पहुंचे पिता परशुरामजी को भक्ति का उपदेश देते हुए दी थी।

108 जड़ीबूटियों से होता है अभिषेक, दो समय पूजा
बांके बिहारी मंदिर में स्थित इस मूर्ति की प्रतिदिन की पूजा के अलावा जन्माष्टमी पर विशेष पूजा अर्चना होती है। मंदिर के पुजारी बिहारी लाल पारीक ने बताया कि जन्माष्टमी पर मंदिर में श्रीकृष्ण भगवान की दो बार पूजा की जाती है। सुबह आम के पत्तों ओर कंडील की ढ़ालियों से बगीचा सजाकर भगवान कृष्ण की प्रतिमा का 108 विशेष जड़ी बुंटियों से अभिषेक किया जाता है। जो ढ़ाई से तीन घंटे तक चलता है। प्रसाद वितरण के बाद रात 12 बजे कृष्ण जन्मोत्सव पूजा- अर्चना के साथ मनाया जाता है।

ब्रम्हापुरी में जन्मी थी करमैती बाई, श्रीकृष्ण ने करवाया था भोजन
भक्तमाल ग्रंथ के अनुसार करमैती बाई खंडेला के शेखावत राजा के पुरोहित परशुरामजी की बेटी थी। जो बचपन से ही कृष्ण भक्त थी। 12 वर्ष की उम्र में जयपुर के सांगानेर के जोशी परिवार में विवाह के बाद जब पति गौना करवाने आए तो पहली रात को ही वह पैदल घर से निकल गई और रास्ते में मिले तीर्थयात्रियों के साथ वृंदावन पहुंचकर कृष्ण भक्ति करने लगी। जहंा भक्तमाल के अनुसार 18 दिनतक भूखी- प्यासी रहने के बाद खुद भगवान श्रीकृष्ण ने उन्हें संत वेष में दर्शन दिए और अपने हाथ से प्रसाद ग्रहण करवाया था।

यमुना से निकालकर दी मूर्ति, पिता के बाद राजा भी बने भक्त
भक्तमाल के अनुसार करमैती बाई के वृंदावन पहुंचने की सूचना पर पहले पुरोहित पिता परशुराम उन्हें लेने गए। जहां करमैतीबाई के लौटने से इन्कार करने पर उन्होंने खाली हाथ घर नहीं लौटने की बात कही। इस पर करमैती बाई ने यमुना नदी से ये मूर्ति निकालकर भक्ति के उपदेश के साथ पिता को दी। जिसे खंडेला में प्रतिष्ठित कर पिता भी कृष्ण भक्ति में लीन रहने लगे। जब शेखावत राजा को इसकी जानकारी हुई तो वे भी पहले परशुरामजी से मिलकर करमैती बाई से मिलने वृंदावन गए। जहां वह यमुना नदी के पास श्रीकृष्ण वियोग में आंसु बहाती मिली। करमैती बाई की भक्ति से राजा का भाव भी भक्तिमय हो गया और हठ करके उन्होंने ब्रम्हाकुण्ड के पास कर्मेती बाई के लिए एक कुटी बनवा दी। फिर वापस लौटकर वे भी कृष्ण भक्ति में ही लग गए।