LetsInspireBihar अभियान के अंतर्गत वैशाली में युवा संवाद

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ONE NEWS LIVE NETWORK WEBTEAM

http://Onenewslive.net/Senior IPS Vikash Vaibhav

वैशाली में #यात्रीमन ! #LetsInspireBihar अभियान के अंतर्गत #युवासंवाद हेतु शनिवार, 30 अक्तूबर, 2021 को वैशाली जिले में उपस्थित था । जब पाटलिपुत्र से वैशाली की ओर #यात्रा कर रहा था, तब यात्री मन दोनो नगरों के इतिहास के प्रसंगों का स्मरण कर रहा था तथा वर्तमान परिदृश्य के साथ उनकी तुलना भी कर रहा था । इसी क्रम में गंगा पार करके जैसे ही वैशाली के भूक्षेत्र की ओर देखने लगा, मन में बड़े ही स्वाभाविक रूप में यह प्रश्न उमड़ने लगा कि भला कहाँ अदृश्य हो गई वह दूरदर्शी #दृष्टि जिसने कभी उस प्राचीनतम कालखंड में #वैशाली जैसे सशक्त गणराज्य की परिकल्पना की थी ? सभास्थल की ओर यात्रा के क्रम में जब और चिंतन करने लगा तब यह प्रतीत हुआ कि मन में प्रश्न का उमड़ना तो अत्यंत स्वाभाविक ही था चूंकि वर्तमान में भले ही प्रजातंत्र संपूर्ण विश्व में शासन हेतु सर्वश्रेष्ठ व्यवस्था के रूप में मान्य है, परंतु उस प्राचीन काल में जब सभ्यता के विकास के साथ राजतंत्र ही स्थापित व्यवस्था के रूप में सर्वमान्य हो चुकी थी, तब किसी अपवाद को स्थापित करने की परिकल्पना भी निश्चित ही साधारण बात तो नहीं ही थी ।

वैशाली की गाथा अद्भुत है । वैशाली दर्शाती है कि स्थापित परंपराओं के समक्ष भी हमारे पूर्वजों की दृष्टि कभी अवरूद्ध नहीं हुई और सकारात्मक चिंतन के साथ सुधारात्मक परिवर्तनों के लिए वे सभी प्रकार के अपवादों तथा संभावनाओं पर सतत् विचारण करते रहते थे । तभी तो मानवहित को सर्वोपरि मानते हुए अपेक्षाकृत सुधारों के निमित्त राजतंत्र के अपवाद स्वरूप न केवल सर्वप्रथम #वैशाली में उनके द्वारा गणतंत्र की परिकल्पना की गई अपितु उसे सशक्त रूप में स्थापित भी कर दिया गया । उस काल की वैशाली राजधानी थी उत्तर बिहार में अवस्थित वज्जी महाजनपद के उस विशाल भूक्षेत्र की जिसके उत्तर में हिमालय, दक्षिण में गंगा, पूर्व में कौशिकी (कोशी) तथा पश्चिम में नारायणी (गंडक) सीमाओं को निर्धारित करते थे । इस विशाल भूखण्ड के भिन्न-भिन्न क्षेत्रों में चुने जाने वाले 7707 गणराजाओं द्वारा प्रत्येक वर्ष अपने गणाधिपति तथा राज्यपरिषद का नियमित चयन वैशाली नगर के विशाल संथागार में व्यापक विमर्श के पश्चात किया जाता था । आज जब प्रौद्योगिकी तथा सूचना तंत्र के अत्यंत विकसित होने के पश्चात भी अत्यधिक संख्या में व्यक्तियों द्वारा मिलकर दीर्घकालिक विमर्श करने के पश्चात भी सर्वमान्य निष्कर्ष पर पहुंचना आसान नहीं होता, तब मन स्वाभाविक रूप में चिंतन करता है कि भला वह कैसी दृष्टि रही होगी जिसके स्वरूप वैसे अद्भुत गुण हमारे पूर्वजों में स्थापित और स्थिर होते चले गए, जो दूरदर्शी तथा बृहत्तर चिंतन के साथ सकारात्मक परिवर्तन के लिए अपवादों के प्रस्तुतीकरण हेतु तत्पर रहने के निमित्त प्रेरित करने लगे, अन्यथा गणराज्य स्थापित करने की परिकल्पना तो संपूर्ण विश्व में कहीं अन्यत्र भी जागृत हो सकती थी ?

मन उन पूर्वजों के गुणों का स्मरण करते हुए कहता है कि निश्चित ही उनकी सोच तो अत्यंत दूरदर्शी थी ही, साथ में अच्छी बात तो यह भी थी कि सामाजिक उन्नति के उद्देश्यों के लिए पारस्परिक सहयोग की भावना भी उनमें सहज रूप में व्याप्त थी । विश्व के अन्य क्षेत्रों से यदि तुलना करें तो उस काल में ऐसी अनुभूति का होना निश्चित ही असाधारण था कि कोई भी व्यक्ति शासन कर सकता है यदि वह सक्षम हो और यदि उसकी भावना जनहित में हो । चूंकि उनकी सम्यक दृष्टि महान थी, अतः ऐसी भावनाओं को उत्तराधिकार की संभावनाओं में बांधने के लघुवादी दृष्टिकोण से हटकर चुनाव तथा सर्वसम्मति से चयन करना ही राज्यहित में उनके द्वारा उचित पाया गया । मन ऐसे पूर्वजों पर इसीलिए गौरवान्वित होता है चूंकि उस काल में ऐसा चिंतन सामान्य नहीं था और वह भी तब जब विश्व के अधिकांश क्षेत्रों में सभ्यता तो विकसित भी हुई ही नहीं थी और जहाँ हुई भी थी, वहाँ शासक का चयन वंशवाद से ही ओतप्रोत था ?

ऐसे में वैशाली न केवल सशक्त प्रतीक है हमारे यशस्वी पूर्वजों के बृहत्तर चिंतन एवं तीक्ष्ण दृष्टिकोण का अपितु उस अद्भुत बौद्धिक विरासत का भी जो बिहार के उज्ज्वलतम भविष्य की संभावनाओं के प्रति आशान्वित करती है । इसीलिए वैशाली में आयोजित सभा में पहुंचकर और सभी को वहाँ एकत्रित देखकर मन में इच्छा हुई कि वर्तमान वैशालीवासियों को यह स्मरण कराया जाए कि उनका इतिहास क्या था और किस प्रकार ऐसी अद्भुत दृष्टि एवं सामर्थ्य के धनी गणराज्य का भी पतन संभव हो सका । उपस्थित युवाओं से सर्वप्रथम मैंने प्रश्न किया कि उनमें से कितने व्यक्तियों ने वैशाली के भग्नावशेषों का भ्रमण अथवा अवलोकन किया था । सभा में जब अनेक हाथों को मैने उठते देखा, तब प्रसन्नता व्यक्त करते हुए मैंने यह कहा कि भ्रमण करना तब ही सार्थक सिद्ध होगा जब उस प्राचीनतम संदेश को हम ग्रहण कर आत्मसात करेंगे जिसका प्रतिनिधित्व वर्तमान में भी वैशाली करती है ।

आगे मैंने सभा से कुछ और प्रश्न भी किए जिनके क्रम में यह जानकर मैं अत्यंत अचंभित हो गया कि अपनी ही विरासत से हमारे युवा कितना कट चुके थे । संपूर्ण सभागार में ऐसा एक भी व्यक्ति नहीं था जिसे वज्जी महाजनपद की प्राचीन सीमाओं का ज्ञान था अथवा यह अनुमान भी था कि किस प्रकार 7707 गणराजा प्रत्येक वर्ष संथागार में उपस्थित होते थे तथा अभिषेक पुष्करणी में अभिषिक्त होते थे । तब मैंने प्राचीन इतिहास का स्मरण करते हुए सभी को बताया कि हमारे पूर्वजों के किस प्रकार के दूरदर्शी चिंतन ने वैशाली को कभी स्थापित किया था । वैशाली अपने दूरदर्शी सम्यक चिंतन के कारण भगवान बुद्ध को भी अत्यंत प्रिय थी और मगध साम्राज्य के प्रसार में सबसे प्रबल बाधक के रूप में प्रस्तुत हो चुकी थी चूंकि मगध की सीमाओं के विस्तार में सबसे निकटवर्ती और सशक्त अवरोधक वैशाली ही थी । कारण केवल वैशाली का चिंतन ही नहीं था परंतु उस दूरदर्शी चिंतन से उत्पन्न सहयोग की भावना भी थी जिसने विश्व के प्रथम गणतंत्र में एक शक्तिशाली सेना की भी स्थापना की थी जिसके समक्ष मगध का सैन्यबल भी स्वयं को निशक्त पाता था ।

मगध विस्तार चाहता था परंतु वैशाली के सतत् बढ़ते हुए प्रभाव के कारण अवरूद्ध था । परिस्थिति ऐसी थी कि मगध की राजधानी रही पाटलिपुत्र और वैशाली द्वै नगरों की सीमा के रूप में अवस्थित मातृस्वरूपिनी गंगा में नावों पर हो रहे व्यापार पर कर लगाने में भी अक्सर दोनों महाजनपदों में विवाद होते रहते थे । इसी काल में जब गंगा के मध्य अवस्थित किसी द्वीप पर रत्नों के खदान मिलने की सूचना मिली तो निश्चित यह प्रतीत हुआ होगा कि दोनों में घोर विवाद संभव था । विवाद न हो, इसके समाधान के रूप में यह तय हुआ कि मगध अथवा वैशाली में से जो भी खुदाई में रत्नों को प्राप्त करेगा, वह उनको दो बराबर भागों में विभक्त करेगा । कुछ समय तक ऐसा हुआ भी परंतु शक्ति के दंभ में मग्न वैशाली को कुछ समय के पश्चात यह लगने लगा कि उसे मगध को भाग देने की कोई आवश्यकता नहीं थी और उसने मिले रत्नों को मगध को देना बंद कर दिया ।

जब मगध नरेश अजातशत्रु को इसकी सूचना अनेक माध्यमों से प्राप्त हुई तो वह अत्यंत क्षुब्ध हुए और तब उन्होंने वैशाली के प्रभाव को नष्ट करने का संकल्प लिया । जब उन्हें लगा कि शक्तिशाली वैशाली के गणराज्य का पतन करना सुलभ नहीं था, तब उन्होंने अपने प्रमुख अमात्य वस्साकार को वैशाली के पतन के रहस्यों को जानने भेजा । वस्साकार इस उद्देश्य के निमित्त तब वैशाली के समीप चिंतनरत भगवान बुद्ध के पास पहुंचे । वहाँ अपनी बातों को उन्होंनें उनके प्रमुख शिष्य आनंद से कहा और उनसे निवेदन किया की भगवान बुद्ध से इस संदर्भ में उत्तर पूछा जाए । जब आनंद ने भगवान बुद्ध से इस संदर्भ में प्रश्न करना चाहा तब उन्होंने आनंद से ही अनेक प्रश्न किए जिसमें मुख्य रूप से उन्होंने पूछा कि क्या वैशाली में सभाएं नियमित रूप से होती थीं जिनमें गणराजाओं तथा मंत्रिपरिषद के सदस्यों के मध्य सहयोग की भावना दर्शित होती थी अथवा नहीं । वैशाली के नैतिक एवं चारित्रिक मूल्यों के संदर्भ में भी उन्होंने आनंद से अनेक प्रश्न किए। सभी प्रश्नों के उत्तर में जब आनंद ने बताया कि वैशाली सभी स्थापित आदर्शों का पूर्णतः अनुपालन कर रही थी, तब भगवान बुद्ध ने कहा कि जब तक ऐसा ही होता रहेगा, तब तक वैशाली का पतन संभव नहीं होगा और अभिवृद्धि ही होती रहेगी ।

इन बातों को सुनकर वस्साकार अत्यंत चिंतित हुए और उन्होंने लौटकर सभी बातें मगध नरेश अजातशत्रु को बताई। अजातशत्रु ने धैर्यपूर्वक सभी बातों को सुना और प्रारंभ में चिंतित भी हुए परंतु उनके मन में वैशाली की शक्ति को नष्ट करने का ध्येय अत्यंत स्पष्ट था । अतः जब वह चिंतनरत हुए तब उन्होंने वस्साकार से कहा कि निश्चित ही यह चिंता का विषय था कि जब भगवान बुद्ध ने ही यह कह दिया था कि वैशाली का पतन संभव नहीं है और उसकी अभिवृद्धि ही होगी तो इसमें संदेह भला कहाँ था, परंतु उन्होंने तब यह बताया कि भगवान बुद्ध की सभी बातों पर चिंतन करने पर उन्हें वैशाली के पतन के कारक भी इसी क्रम में अत्यंत स्पष्ट हो गए थे । अजातशत्रु ने कहा कि भगवान बुद्ध ने वैशाली की अभिवृद्धि का कारण उसका स्थापित आदर्शों के अनुपालन के साथ-साथ पारस्परिक सहयोग की भावना को बताया था । वैशाली में सभाएं नियमित रूप से होती थीं और सहयोग की भावना के कारण ही हर विषय पर विमर्श के उपरांत सर्वमान्य निष्कर्ष पर राज्यपरिषद के सभी प्रमुख सदस्य पहुंच पाते थे । उन्होंने वस्साकार से इसी सहयोग की भावना को नष्ट कर वैशाली के गणराजाओं तथा राज्यपरिषद के सदस्यों के मध्य संघर्ष उत्पन्न करने को कहा और इसके निमित्त योजना के अनुसार जब वस्साकार ने मगध की राजसभा में वैशाली की प्रशंसा की, तब उन्हें मगध से निष्कासित कर दिया गया ।

निष्कासित वस्साकार को तब वैशाली ने सहानुभूतिपूर्वक शरण प्रदान किया । वैशाली में प्रवास के क्रम में वस्साकार ने धीरे-धीरे स्वयं को स्थापित किया और राज्यपरिषद के प्रमुख सदस्यों के मध्य पैठ बनाते हुए उन्होंने पारस्परिक फूट डालने का कार्य प्रारंभ कर दिया । इसके परिणाम भी शीघ्र ही आशातीत रूप में दर्शित होने लगे । जहाँ पारस्परिक सहयोग तथा बृहत्तर चिंतन के साथ वैशाली की राज्यपरिषद हर विषय पर पूर्व में सुलभता से आवश्यक विमर्श के उपरांत मतेक्य को प्राप्त कर लेती थी, वहीं अब राष्ट्रीय सुरक्षा जैसे विषयों पर भी वैचारिक मतभेद तथा संघर्ष होने लगा जिससे उपजी मतभिन्नता के कारण किसी भी विषय पर सर्वमान्य निर्णय लेना कठिन होने लगा । वस्साकार के प्रभाव के कारण 3 वर्षों में वैशाली की स्थिति ऐसी हो चुकि थी कि मगध नरेश अजातशत्रु को आक्रमण का समय उपयुक्त दिखने लगा। इतिहास साक्षी है कि तत्पश्चात वैशाली नष्ट हो गई। जहाँ सहयोग का स्थान संघर्ष ने लिया, उसने वैशाली जैसी वैचारिक रूप से उन्नत तथा सामरिक रूप से सशक्त महाजनपद को भी जड़ समेत उखाड़ फेंका ।

यदि आज भी हम इतिहास में कारित त्रुटियों से सीख नहीं लेंगें तो निश्चित ही वही त्रुटियां हम पुनः कारित करते रहेंगे । आवश्यकता चिंतन की है तथा इतिहास के संदेश को आत्मसात कर इस संकल्प को लेने की है कि जिन लघुवादों तथा दृष्टिकोणों ने पूर्व में हमें हानि पहुंचाई थी, हम उनका पुनः अनुकरण नहीं करेंगे । आवश्यकता चिंता नहीं अपितु चिंतन की है । आवश्यकता संघर्ष की नहीं अपितु सहयोग को है । आवश्यकता अतीत को समझते हुए वर्तमान में योगदान समर्पित करने की है जिससे वांछित एवं कल्पित उज्ज्वलतम भविष्य का निर्माण संभव हो सके ।

आइए, मिलकर प्रेरित करें बिहार ! आइए, मिलकर #3Es यथा #शिक्षा (Education), #समता (Egalitarianism) तथा #उद्यमिता (Entrepreneurship) के विकास में योगदान कर उज्ज्वलतम भविष्य का निर्माण करें ! अभियान से जुड़ने के लिए इस लिंक का प्रयोग कर सकते हैं –

https://forms.gle/bchSpPksnpYEMHeL6