वर्ण-व्यवस्था को हल किये बगैर लोकतंत्र संभव नहींः उर्मिलेष

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 पटना से अरुण नाराण की रिपोर्ट 

‘इस देश की समस्या बहुत बड़ी है। प्रेस फ्रीडम का सवाल हो या ह्यूमन इंडेक्स का अन्य कोई क्षेत्र हम दुनिया के स्तर पर आज भी अन्य देशों की तुलना में बहुत नीचले पायदान पर खड़े हैं। लोकतंत्र आपके देश में मजाक बनकर रह गया है। उसके हल के लिए महान संतों की जरूरत है। वे संत आज के ढोंगी बाबा नहीं हो सकते वे हो सकते हैं-नारायण गुरु, ज्योतिबा फुले, पेरियार और आंबेडकर की तरह के संत, जो अपने लिए नहीं समाज के लिए सोचें।’
ये बातें वरिष्ठ पत्रकार उर्मिलेश ने कल पटना के स्थानीय आई.एम.ए हाॅल में कहीं। सामाजिक न्याय आंदोलन बिहार की पहल पर आयोजित यह कार्यक्रम चैतरफा बढ़ते मनुवादी, सांप्रदायिक हमले व काॅरपोरेट कब्जा के खिलाफ बहुजन दावेदारी सम्मेलन के रूप में आहूत की गई थी। बिहार सहित कई राज्यों से आये इस सम्मेलन को पूर्व राज्यसभा सदस्य अली अनवर अंसारी, चर्चित पत्रकार अनिल चमड़िया, आंदोलनकारी लक्ष्मण यादव, प्रो. शिवजतन ठाकुर, वाल्मीकि प्रसाद, डाॅ. पी.एन.पी.पाल, जितेंद्र मीणा, सुमित चैहान, बलवंत यादव, राजीव यादव, अयूब राईन, विजय कुमार चैधरी, आईडी पासवान, नवीन प्रजापति, रामानंद पासवान, केदार पासवान, राजेंद्र प्रसाद, और डाॅ विलक्षण रविदास ने भी संबोधित किया। वक्ताओं ने देशभर में बढ़ते भगवा हमले, आदिवासियों के विस्थापित होने और बहुजन राजनीति के ए टू जेड में तब्दील होने के कारणों पर गहराई से चिंतन मनन किया।
वर्तमान राजनीतिक सिनेरियो की चर्चा करते हुए पत्रकार उर्मिलेश ने कहा कि आज जितनी भी राजनीतिक पार्टी है वह व्यक्तियों के नाम पर है। वे सब अपने-अपने साम्राज्य रक्षा में लगी हैं, जो डरा सहमा है वह चुनाव कैसे जीत सकता है? मायावती की चर्चा करते हुए उन्होंने सवाल उठाया कि उनका पतन क्यों हुआ और कहा कि उनके पास काशीराम की एक महान विरासत थी उसका विस्तार नहीं करके वह अपना परिवार बचाने में लगी हैं। उन्होंने कहा कि दुखद पहलू यह है कि एक दल है जो एलायंस बनाता है, तुड़वाता है वह कौन है आप भलीभांति अवगत हैं।
उर्मिलेश से प्रश्नाकुल होते हुए कुछ सवाल उठाये। कहा देश इतना भयावह रूप में क्यों आया, क्या यह अपने आप अचानक आ गया या मंडलवादी शक्तियों की विफलता के कारण आया या आजादी की लड़ाई में ही वे तत्व थे जिसके कारण यह परिस्थितियां बनीं? फिर कहा इन सब में कुछ न कुछ सच है हालांकि यह सम्पूर्ण सच नहीं है। यह संशय आजादी की लड़ाई के समय भी था। हमारे राष्ट्र निर्माताओं में कैसा भारत बनाना चाहिए इस सवाल को लेकर एक राय नहीं थी। भारत किस तरह का राष्ट्र बनेगा, इन संचालक शक्तियों का एजेंडा क्या हो इन विचारों को लेकर एकरूपता नहीं थी। कांग्रेस में गांधी के पूर्व एक बड़ा हिस्सा कंजर्वेटिवों का था। वे ही कांग्रेस को डौमिनेट करते थे। वे बड़े जमींदार होते थे, वे ही उस दौर में लड़ाई के अगुआ थे। गांधी ने उस कांग्रेस को ‘मास राजनीति’ की पार्टी में तब्दील किया। इसके फलस्वरूप नेहरू, पटेल जैसा नेता उभरे। आजादी की लड़ाई चल रही थी उस दौर में बहुत सारी समस्याएं थीं और बहुत सारी धाराएं इमर्ज हुईं।
भगत सिंह की धारा वैज्ञानिक जीवन पद्धति और सही ढंग से समाज संचालन को सामने रख रही थी अगर वे 25 साल और रहे होते उनकी वैचारिकता का लाभ भारतीय समाज को जरूर मिला होता। इतनी कम उम्र में ही उन्होंने जिस तरह से अछूत, किसान समस्या पर विचार किया और ग्रीनलैंड की भूमिका जैसा लेख लिखा उससे उनके परिप्रेक्ष्य को समझा जा सकता है। उन्होंने गणेश शंकर विद्यार्थी के ‘प्रताप’ में अनियमित काॅलम लिखा। उनकी पार्टी में भी तरह-तरह के लोग थे। कंजर्वेटिव भी थे लेकिन इसी में भगत सिंह एक आडियोलाॅग के तौर पर इमर्ज होते हैं।
तीसरी धारा था भीमराव आंबेडकर की। वे कांग्रेस की पूरी आजादी की लड़ाई के पर्सपेक्टिव को खारिज करते थे। उन्होंने अपनी राइटिंग में 1920 से 50 के दशक की भारतीय राजनीति के बारे में जो कुछ भी कहा वह आज भी उतना ही प्रासंगिक नजर आता है। आजादी की लड़ाई में वे एक ऐसे चिंतक के रूप में उभरते हैं जो कांग्रेस के एजेंडे को पूरी तरह खारिज करते हैं। सामाजिक, आर्थिक मसलों पर उस दौर का उनका चिंतन चामात्कारिक है। ट्रेड यूनियन और महिला राइट के साथ उन्होंने संविधान को एक्सटेंड किया। उन्होंने राष्ट्र राज्य के लिए ही नहीं अपितु आम लोगों के जीवन में सुधार लाने के लिए बहुत सारा काम किया। उन्होंने यह महसूस किया था कि आम लोगों की जीवन दशा एक आदमी एक वोट से ही नहीं सुधरेगी। अपने आखिरी स्पीच में उन्होंने चेताया था कि हम तब तक जनतांत्रिक नहीं हो सकते जब तक आर्थिक, सामाजिक जीवन में असमानता को न्यूनतम नहीं करते। तब तक भारत में संवैधानिक लोकतंत्र का भविष्य नहींे है।
उर्मिलेश ने कहा कि भारत का संविधान बाबा साहब के सपनों का संविधान नहीं है। सोशलिस्ट और कम्युनिस्ट दोनांे विचार के लोगों ने इसका विरोध किया था। लोहिया, जयप्रकाश और नरेंद्र देव इस संविधान सभा की कमिटी में नहीं गए। उन्होंने कहा कि अर्थशास्त्र और कानून के पूरे स्वाधीनता आंदोलन में आंबेडकर से बड़ा जानकार कोई नहीं था। ऐसे ही नहीं उन्हें संविधान सभा के ड्राफिटंग कमिटी का चेयरमैन बनाया गया। बाबा साहब के चेयरमैन बनने से पहले तीन विदेशी विद्वानों के नाम इस पद के लिए आये थे लेकिन मजबूरी में कांग्रेस को बाबा साहब को चेयरमैन बनाना पड़ा। उर्मिलेश ने माना कि हमारी बहुत सारी समस्याएं बुनियादी तौर पर आजादी के बाद भी हल नहीं हुईं। बाबा साहब की पार्टी को भी आर्थिक सपोर्ट करने वाली ताकतें नहीं थीं। हमारे यहां ब्रिटिश न आते तो बहुजन समाज के लोग शिक्षित होने का सपना भी नहीं देख सकते थे। उन्होंने लूट के बावजूद सामाजिक सुधारों को बल दिया। टे्रड यूनियन राइट बाबा साहब की वजह से मिला। भगत सिंह 40 साल के होते और भीमराव और भगत सिंह दोनों मिल गए होते तो शायद वह भारत के लोकतंत्र के लिए एक बेहतर मुकाम साबित होता।
उर्मिलेश ने कहा कि जो आजादी मिली उसके बुनियाद में समस्याएं थीं। उस अंतर्विरोध को केरल, कर्नाटक, तमिलनाडु और कश्मीर जैसे कुछ राज्यों में हल करने की कोशिश हुईं। राजनीतिक लोकतंत्र के साथ इन राज्यों में सामाजिक, आर्थिक लोकतंत्र कायम करने की कोशिशें हुईं। भूमि सुधार और शिक्षा में बदलाव को इन राज्यों ने अपने तरीके से हल किया।
इस मुल्क में हिन्दू राज की आधारशिला रखी जा चुकी है। संविधान का मतलब क्या है हमारे लिए? प्राकृतिक सम्पदा का दोहन समाज के लिए होना चाहिए लेकिन यह लोगों की कीमत पर काॅरपोरेट के लिए हो रहा है। उन्होंने कहा कि आर्टिकिल 39 को यदि कांग्रेस मजबूज बनाती तो आज देश को इसका दुष्परिणाम इस तरह नहीं भुगतना पड़ता। इसके अनुसार नदियों, खदानों को काॅरपारेट के हवाले नहीं कर सकती थी। आरक्षण खत्म किया जा रहा है पब्लिक सेक्ंटर को आर्टिकिल 39 के रहते हुए खत्म किया जा रहा है। संविधान संशोधन में आर्टिकिल 39 को मजबूत नहीं किया गया।
उर्मिलेश ने कहा कि आज बहुत सारे नीति निर्धारक को नहीं मालूम कि वे क्या कर रहे हंैं, क्योंकि नीतियां काॅरपोरेट बनाते हंैं। भारत की राजनीतिक पार्टियों के पास आज कोई थिंक टैंक नहीं है। जहां कभी आंबेडकर, लोहिया जैसे लोग रहे। डाक्यूमेंट इतने बोझिल हिन्दी अनुवाद में आते हैं ताकि हिन्दी वाले समझ नहीं सकें। ब्यूरोक्रेट्स का संबंध काॅरपोरेट्स से हैं। काॅरपोरेट और बड़े योजनाकार अपने मकसद से उनका सहारा लेते हैं। जो चुनौतियां हैं उसका हल यहां की राजनीतिक पार्टियों के पास नहीं है। आज की तारीख में तमाम राजनीति पार्टी और नेता अप्रासंगिक हो गए हैं। आज का हिन्दुत्वा वही नहीं है जो सौ साल पहल दीया बाती लेकर आया था। आज उनके पास सबसे बड़ा काॅरपोरेट है। आज वह सामंतवाद और पूंजीवाद के खिलाफ खड़ा नहीं हो सकता है। इस काॅरपोरेट ने आज धार्मिकता और सांप्रदायिकता के साथ गठबंधन कर लिया है। न्यायपालिका का हाल तो और भी बुरा है।
आज हमारे देश की स्थिति यह है कि प्रेस फ्रीडम में हम विश्व के 180 मुल्कों में 150वें स्थान पर हैं और डेमोक्रेसी के ग्राफ में 179 देशों में 93 वें स्थान पर हैं। कहने को खुद को हम दुनिया के महानतम लोकतंत्र में अपने को शुमार करते हैं लेकिन हमारी स्थिति भूटान में जहां का शासन राजपरिवार से चलता है उससे भी नीचे हैं नेपाल आपसे इस मामले में बेहतर स्थिति में हैं पाकिस्तान आपसे थोड़ा नीचे जरूर है। उर्मिलेश ने कहा कि देश में वर्णव्यवस्था के रहते लोकतंत्र की परिकल्पना कैसे की जा सकती है। उन्होंने कहा कि जैसे ही लोगों को पता चलता है कि सामने वाला दलित, आदिवासी और पिछड़ा है वैसे ही उनके मूल्यांकन की कसौटी बदल जाती है। वर्णव्यवस्था का यह चरित्र भारत में जिस तरह का है दुनिया में कहीं नहीं है। जब लोग इसके खिलाफ संघर्ष करते हैं तो इसे पहचान की राजनीति का आरोप लगाकर खारिज करने की कोशिश की जाती है। भारत में वर्ण व्यवस्था और उसके अंतर्विरोध को पहचाने बगैर लोकतंत्र की कल्पना असंभव है। उन्होंने कहा कि वर्णव्यवस्था जनतंत्र के खिलाफ है। वामपंथ की चर्चा करते हुए उन्होंने कहा कि यहां के वामपंथी सबसे पढ़े-लिखे लोग हैं बावजूद इसके इसके वामपंथ का क्षेत्र बढ़ने की बजाय सिकुड़ता ही चला गया। त्रिपुरा, बंगाल और केरल में एक समय में उनकी सरकारें थीं लेकिन दो जगहों से खत्म हो गए। केरल मे वे दूसरी बार चुनाव जीते वहां वे दूसरी बार चुनाव क्यों जीते इसके पीछे समाज सुधार का एक बैकग्राउंड है बंगाल वे इसे ही नहीं समझ सके। केरल के वामपंथियों ने नारायण गुरु और अयंकली की परम्परा का अनुसरण किया, वहां अच्छे ईमानदार और सक्षम समर्थ लोग हैं।
इस मौके पर मौजूद लोगों में महेंद्र सुमन, इंजीनियरन नागेंद्र यादव, सुनील, गौतम आनंद, मीरा यादव, विष्णुदेव मोची, ललित यादव, उत्पल बल्लभ, सूरज यादव, रंजन यादव, मृणाल, सोनम राव आदि मुख्य थे।